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अन्तर्मन………. एक द्वन्दयुद्ध

By |2020-02-17T12:54:24+00:00February 17th, 2020|Inspiring Story, People|

          ” घर, समाज और तालीम उसे यह नजरिया ना दे पाये थे की किसी व्यक्ति को वस्तु नहीं बनाना होता। “

                                                                                                                                   – अमृता प्रीतम

                        अमृता जी की कलम से निकले ये शब्द कालांतर से चली आ रही हमारे समाज की “मर्दानगी” पे गहरी चोट करते हैं। इस पुरुष प्रधान समाज की उस रूढ़िवादी मानसिकता को दर्शाते हैं, जिसके द्वारा महिलाओं का शोषण किया जाता है। ज़रूरत है तो बस  बदले नज़रिये से  एक नज़र देखने की, फिर ये पीड़ित महिला कही भी मिल सकती है – कभी कही किसी बाबा के डेरे में, तो कभी फंसी रीती रिवाज़ों के फेरे में, कभी कही बुर्खे  में से झांकती, तो कभी कार्यस्थल में हो रही ज़्यादतियों को भाँपती। शोषण किसी भी प्रकार का हो –  मानसिक या शारीरिक, असर गहरा छोड़ता है। मष्तिष्क की जड़ो को हिला देता है,  समूचे वजूद को धरातल पे ला पटकता है, अस्तित्व को झकझोड़ के रख देता है। लेकिन जब सब्र का बाँध टूटता है तो फिर आता है सैलाब। आक्रोश में रौंदता, अनर्गल बयानों को डूबोता, सब कुछ तहस नहस करने पे आमादा, सैलाब । लेकिन वो सोचने पर भी मजबूर करता है है की ये सैलाब आया कैसे? कैसे शांत चित, कल कल बहता, जीवनदायी  वो दरिया, एक दम से रौद्र एवं विकराल रूप धारण करता है।  समझने वाली बात तो ये है की क्या उथल पुथल चलती होगी उस अंतर्मन मे? कैसे वो  व्यथित मन इतनी हिम्मत जुटाता होगा ? कैसे अपने आप को तैयार करता होगा, अपने संग हुए अन्यायों के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए ? कैसे एक भयभीत, शोषित, कुपित, विचारों के भंवर में  उलझा  मन, भयमुक्त होकर आवाज़ उठाता होगा ? ऐसे ही सोच में उलझी थी, मानसी उस दिन।

                  दिन भर रही वो एक अजीब सी उधेड़ बुन में। गुमसुम सी, खामोश, फँसी न जाने कैसी कशमकश में। किसे बताये, राज़ से पर्दा उठाये, ना जाने कैसे ये उलझन सुलझाये। थी नामंज़ूर हुई जो बात, पर इस बेहया दुनिया में क्यों अपना माखौल उड़वाए। पीठ पीछे की छीटांकशी सहन न होगी, इस बेरहम दुनिया के रवैये का कैसे सामना करेगी। लौट के आना है फिर इसी जगह, चढ़ी भौंए, निहारती नज़रें सब बयां करेंगी। उठाई जो उसने ऊँगली एक, बाकी तीन भी उसकी ओर ही इशारा करेंगी। ताली एक हाथ से नहीं बजती यही समझाया करेंगी। इतनी देर से जो पलके झपकी भी ना थी, ना जाने अपने आप कब बंद हो गई। अशांत मन की उथल पुथल दूर तक फैली ख़ामोशी में बदल गई। न जाने कैसे उस रात, जागते जागते वो सो गई।

                   भोर की पहली किरण ने निंद्रा तोड़ी, बेमन लेटी  रही वो, बिस्तर ना छोड़ी। उस पल चाहिए था सर पर फिरता वो हाथ। एक आश्वासन “चिंता न कर बेटी, हम है न तेरे साथ ” याद आई पिता की वो सीख, – “गर सच्ची है तू ,डरना नहीं, अडिग चलना कर्त्तव्य पथ पर हमेशा मिलेगी जीत। ” कर लिया जो निश्चय, उतार फेकेगी नकाब तू चेहरों से। बना बैठा है जो चरित्रवान दिखेगा चरित्रहीन जब निकलेगा वो अपनी केंचुली से।

                       अंतर्मन  में उठी पुकार – दुनिया ने तो भगवन पे भी ऊँगली उठाई । श्चुब्ध है क्यूँ, उसने तो पवित्र पावन सीता से अग्नि परीक्षा करवाई। सोलह आने सच है जो बात, ना उसको तू छुपा, पैरों तले रौंदने से, अपने आँचल को तू बचा। उठ …… उठ के कर प्रतिज्ञा भीष्म सी तू । सामने अगर कोई अपना भी हो, उठाले आज अस्त्र अर्जुन सा तू। मत भूल, दुर्गा है तू, चंडी भी तू। जो बन पड़ी है आन  पर आज, दहाड़ दे सिंहनी  सा तू। पीछे तेरे माधव है, डर मत पगली दुर्योधन से तू । उठ, संजय बन कुरुक्षेत्र का हाल सुना दे, धृतराष्ट्र बने इस अंधे समाज को तू ।
                          देखना… देखना फिर तूती बोलेगी, रणबांकुरों सी ख्याति डोलेगी। गड़ेंगे झंडे स्वाभिमानी के, जब टिकेंगे घुटने अभिमानी के। हिम्मत तो कर नहीं है तू हारी, तेरी एक पहल देगी न जाने  कितनो को बारी।
                                                   पोंछ  वो आंसू उठ गई, दृढ निश्चयी फिर वो बढ़ गई।

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About the Author:

शिवम् "बानगी" - लखनऊ से ताल्लुक़ रखने वाले और दून की वादियों में बसे, जिनकी क़लमकारी बानगी है, हर उस पल की जो बीत गया, कभी ना वापस लौटने को। मगर जाते, जाते दे गया टीस दिल को और हुनर दिमाग़ को। हुनर जो दर्द को बयाँ कर सके।

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