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ईश्वर का अद्भुत उपहार

By |2020-04-04T10:05:06+00:00February 19th, 2020|Inspiring Story, People|

तापमान तो पहले ही दस डिग्री सेल्सियस के नीचे था, तो ठंड कुछ कम तो नहीं थी | और रात में बहुत  जोर से दो  लहरा पानी का आया, ऊपर से सुबह-सुबह की पछुआ हवा, कोहरा तो इतना घना था कि सूर्य देव भी निकलने से डर रहे थे | पता नहीं कैसे मेरी आँख उस दिन जल्दी खुल गयी, कम्बल से निकलने का दिल तो नहीं कर रहा था| पर शायद नींद पूरी हो ही गयी थी, जो मैं उठ गया| प्रातः काल की नित्य क्रिया के बाद सोचा जरा बाहर चलकर घूम लिया जाए, चौराहे पर जाकर थोड़ा गप ही मार लिया जाए, छुट्टियाँ तो थी | जब थोड़ा नाश्ता करके बाहर कदम रखा, तो तपाक से वापस घर में घुस गया | दीदी से मफलर माँगा, स्वेटर तो पहने हुआ था, जैकेट भी पहन लिया, उसके बाद जूते साट लिए | मतलब पूरी सुरक्षा व्यवस्था बना ली ठिठुरन के विरुद्ध, तब निकला घर से माँ के चरण स्पर्श करके |

घर तो गाँव में था, थोड़ी ही दूर पर चौराहा था उधर ही निकल पड़ा | जैसे ही कुछ दूर आगे बढ़ा एक ऐसे नज़ारा दिखा, जिससे हृदय में गर्मी आई, लेकिन शरीर पर असर नहीं हुआ | हृदय में तो अहसास हुआ, लेकिन शरीर शायद अभ्यस्त नहीं था |

एक औरत कुछ तीस-पैंतीस वर्ष के बीच की होगी मेरे अनुमान से | तन पर न कोई स्वेटर और न ही कोई गरम कपड़ा, जो था वह भी फटा-चिटा चिकट सा, शायद बहुत दिनों की कोई पुरानी साड़ी थी | हाथों में एक सींक वाली झाड़ू था, उसी से अपनी पन्नी से तनी हुई झुग्गी के मोहारे पर जमे हुए पानी को बुहार कर साफ़ कर रही थी | अब उस जमघट से जल न हटाये तो करे भी क्या, आखिर उसे अपनी रोज़ की मांगन को बर्बाद तो करना नहीं | पिछले रोज़ की जो मांगन थी, कुछ टूटे-फूटे मिट्टी के बर्तन में रखे थे, कुछ स्टील के भी थे | स्टील वाले तो नहीं ख़राब होते, लेकिन मिट्टी में रखे हुए चावल सड़ जाते तो आज अपनी छोटे से बच्चे को क्या खिलाती | बस ऐसे ही किसी तरह विधाता के कहर से खुद को बचा रही थी, लेकिन विधाता ने एक बात तो अद्भुत बनायीं, ऐसे कड़ाके की ठंड में उस औरत को अहसास कम कराया|

जब चौराहे की ओर और बढ़ा तो उससे भी अद्भुत नज़ारा था | माँ के साथ में ही उसी कड़ाके की ठंड में, नीले आसमान तले अपने आँगन को पाँच साल का नन्हा सा बालक कैसे साफ़ कर रहा था | एक कुछ आसमानी रंग की आधी बाजू टी-शर्ट पहने हुए, खाकी रंग वाली निक्कर जो प्राथमिक विद्यालय से मिली थी, पहन कर माँ का साथ दे रहा था | बहुत नन्हे से हाथों में बड़ा सा कटोरा था | झुग्गी के सामने ही जो उसका आँगन था, जिसमें कुछ छोटे मोटे गड्ढे जल से भरे हुए थे | नन्हे हाथों की अंजुरी बनाता और फिर उसमें पानी भर कर कटोरे में उलच रहा था | जब कटोरा पानी से भर जाता तो उसे दूर ले जा कर फेंक आता ताकि वह अपना आँगन साफ़ करके फिर वैसे ही सुखा ले जैसे पिछली शाम को था और खेल सके|

इतने कड़ाके की ठंड में माँ-बेटे का निरंतर जल निकासी का प्रयत्न देख मेरी ठिठुरन भी जाती रही | ऐसा मुझे लग रहा था, लेकिन जैसे ही मफलर खोला, कानों में सनसनाती हवाओं की सरसराहट ने मेरा भ्रम तोड़ दिया | जल्दी से फिर बाँध लिया, कि कहीं सर्दी न लग जाए और तबीयत न बिगड़ जाए | चौराहे पर जाते हुए इस दृश्य ने एक बात मुझे समझा दिया ईश्वर ने मुझे अच्छी व्यवस्था दी, सर्दी-गर्मी से बचने के लिए बढ़िया संसाधन दिए, लेकिन उस माँ-बेटे कुछ और भी दिया है | उस बच्चे को शायद कोई विशेष शक्ति दी थी परमात्मा ने, तभी तो इतने कड़ाके की ठंड में बेफिक्र हो कर के अपने माँ के साथ में पानी से खेल रहा था, अपना घर संवार रहा था | शायद वह शक्ति सहनशीलता के रूप में संसाधनों के बदले ईश्वर ने उसे दी हो, जो भी हो, है तो ईश्वर का अद्भुत उपहार|

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सनद तो अभियन्त्रिकी की है, शौक में थोड़ा लिख भी लेते हैं... यूँही दिल में कुछ बात ठहरती है तो कागज़ पर उतार लेते हैं...

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