//जिंदगी… एक जिम्मेदारी।

जिंदगी… एक जिम्मेदारी।

By |2020-03-02T11:25:03+00:00February 29th, 2020|Inspiring Story|

सक्षम, सुशिक्षित परिवार में जन्मी ‘प्रगति’, तीन बहन-भाइयों में सबसे छोटी थी। माँ बाप ने अच्छी परवरिश के साथ बच्चों को हर तरह से योग्य बनाया। भाई डॉक्टर बना, बड़ी बहन किसी कंपनी में विशेष ओहदे पर थीं व प्रगति कॉलेज में व्याख्याता बनीं।

बड़ी बहन की शादी किसी ‘बड़े आदमी’ से हुई पर छोटी-छोटी समस्याओं ने वैवाहिक जीवन को बड़ा कष्टकर बना दिया। शादीशुदा जिंदगी के भयावह रूप को देखकर प्रगति ने शादी न करने का विचार किया।

भैया के अभिन्न मित्र शुभम का इनके घर आना जाना था। कई तत्कालीन विषयों पर सब साथ में परिचर्चा किया करते थे। माता-पिता विवाह के लिए बाध्य कर रहे थे पर शादी के प्रस्तावों को इन्होंने स्पष्ट ना कह दिया। एक बार बात ही बात में शुभम ने पूछा, “शादी क्यों नहीं करना चाहती?”

“अपना आत्मसम्मान खोकर अगर पति के ताने, व्यंग्य, कटाक्ष, उपहास या उपेक्षा का पात्र ही बनना हो तो ऐसी शादी का क्या औचित्य?” प्रगति ने रूखे लहजे में जवाब दिया।

“शादी के बारे में तुम्हारी धारणा इतनी नकारात्मक क्यों है?” शुभम ने जिज्ञासा पूर्वक प्रश्न किया।

“रूप और बुद्धि की मलिका मेरी दीदी ही जब अपनी शादीशुदा जिंदगी में खुश नहीं है तो मुझ जैसी लड़की का क्या होगा…?” प्रगति ने प्रत्युत्तर दिया।

कुछ गंभीर होकर शुभम ने पूछा, “मुझसे शादी करोगी?”

किसी फ़िल्मी नायक जैसी ‘पर्सनैलिटी’ वाले आकर्षक और सौम्य युवा के इस प्रत्यक्ष प्रस्ताव को सुनकर एक पल में प्रगति के चेहरे पर आश्चर्य व विस्मय के अनगिनत भाव आ गए। बेहद चिंतन, मनन चला पर श्रृंगार रस से सर्वथा विहीन मरुस्थल से मन पर मानो प्रेम की बौछार हो गई। अपनेपन की प्यास जगी, कुछ सपने सजने लगे।

परिवार के समक्ष अपनी भावना व्यक्त की। पर सभी ने अपनी असहमति जाहिर की। सभी को मनाने का भरसक प्रयास किया पर बात  मरने-मारने तक आ पहुंची। शुभम के घर आने पर, मुलाकातों पर, फ़ोन पर प्रतिबंध लगाया गया।

विरह-वेदना ने प्रेम की ऊष्मा में घी का काम किया। कुछ समय बाद अपने नाम की सारी धन राशि अपने भाई बहनों के नाम लिख प्रगति घर से चली गयीं। प्रगति व शुभम  ने विवाह किया। अपनी मेहनत व काबलियत से दोनों ने अपना घर बनाया, बसाया।

दीन-दुनिया से बेखबर प्रगति अपने घर संसार में बहुत खुश थीं। प्यार की इस दास्ताँ का प्रतीक प्यारा सा बेटा ‘जयम’ मानो उनकी जीत की ही कहानी कह रहा था। जो भी उनसे मिलता, उनके प्यार व अटूट विश्वास की मिसाल देता… देखकर लगता जिंदगी कितनी खूबसूरत है…।

जयम सात साल का हो गया।। दोनों ने एक और थोड़ा बड़ा घर बनवा लिया।

एक बार किसी “स्पेशल कोर्स” के लिए  शुभम ने प्रगति से कहा। इसके लिए 15-20 दिन जयपुर होस्टल में रहना जरूरी था।

“मैं तो शादी के बाद एक दिन भी आपसे दूर नहीं रही… ये मुझसे नहीं होगा” प्रगति ने कहा।

“क्या मुझ में सिमट कर रह गई हो, कभी मेरे बिना भी रहकर देखो, दुनिया देखो” शुभम ने कहा।

शुभम की जिद से प्रगति जयपुर गईं। दोनों एक दूजे से अलग रहकर मिलने के लिए व्याकुल थे। घंटों फ़ोन पर बतियाते। दोनों के बीच सुप्रभात की वार्ता हुई। शुभम सीकर से चुरू के लिए रवाना हुए व प्रगति कॉलेज जाने के लिए तैयार होने लगी। धोये हुए बालों में सिंदूर भरा ही था कि फ़ोन बजा।

“आप सीकर आ जाओ, शुभम जी का एक्सीडेंट हो गया है…..।”

“कैसे? अभी तो हमारी बात हुई थी!!”

“शुभमजी के पाँव में लगी है। आप आ जाएं” जवाब आया।

गाड़ी में बैठने के बाद जहाँ भी फ़ोन लगाया सबने यही बोला कि पांव में लगी है। प्रगति हिम्मत रखते हुए हनुमान चालीसा पढ़ने लगी।

“सब पाँव की चोट के बारे में बता रहे हैं, हो सकता है कुछ गंभीर मामला हो… तो क्या हुआ सब प्रॉपर्टी बेच कर भी इलाज करवाउंगी, अगर पाँव काम नहीं करे तो क्या? मैं इतनी सक्षम हूँ कि मैं सब संभाल सकती हूँ” विचारों की इसी उधेड़बुन में प्रगतिअपने घर पहुंची। शुभम को बिना किसी चोट के एकदम शांत मुद्रा में लेटा देख प्रगति ने सबसे पहले पांव की तरफ से चाद्दर हटाई और निश्चिंत हुई कि चलो पाँव भी  सही सलामत है।

सारे रिश्तेदार पहुँच चुके थे। शादी के 9 साल बाद अपने बड़े भैया को अचानक सामने देख प्रगति ने अपना आपा खो दिया।” आप यहाँ कैसे…? अपने बहन के पति का इलाज करने आये हो…? अच्छे से अच्छा करना… सबसे बड़े अस्पताल में करवाना… और हाँ, पैसे की चिंता मत करना, अपनी बहन को कमजोर मत समझना” प्रगति चीख-चीख कर कह रही थी।

कभी न जागने वाली निद्रा में सोया शुभम आत्मा के बिना निश्चेष्ट था। सब लोग इस हृदय विदारक दृश्य को देख अश्रु बहा रहे थे। अंतिम संस्कार की सभी क्रियाओं में वो थी, पर आँखों से आँसू नहीं बहे। मन में यही विचार दृढ़ था कि इलाज के लिए ले जा रहे हैं।

साथी के बिछड़ने की पीड़ा पर साथी के होने का अहसास ज्यादा भारी था। इस पीड़ा का कोई पार नहीं था। जीवन की असहनीय त्रासदी कि जिस साथी का साथ पाने के लिये दुनिया को छोड़ा, आज वो साथी अपने साथी को दुनिया में छोड़ गया।

प्रगति को यह सच स्वीकारने में बहुत समय लगा। अपने आँसू छिपाकर वो शून्य में शुभम से घंटों बतियाती। जयम को एक सुशिक्षित, दक्ष व काबिल इंसान बनाने का शुभम का सपना प्रगति के जीवन का लक्ष्य बन गया।

प्रगति की तपस्या रंग लाई। जयम का IIT में चयन हुआ। आज  प्रगति बहुत खुश है, इतनी खुश कि हर्षातिरेक में यही कहती है, “मैंने शुभम का सपना पूरा कर दिया……!!”

जीवन में जब किसी ‘अपने’का साथ छूट जाता है तो उस कमी को कोई भी पूरा नहीं कर सकता। जिंदगी जीना भी एक जिम्मेदारी है जिसे हर हाल में निभाना पड़ता है। तय हमें करना है… हौसले बुलंद करके या पस्त होकर……?

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Homemaker | Interested in writing Poems | Sanskrit Tutor

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