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तमाशा

By |2020-02-26T14:29:58+00:00February 26th, 2020|Inspiring Story|

“टिकट टिकट” बोलता हुआ
बस कंडक्टर आ रहा था सामने से
मैंने भी खरीद ली टिकट पूरे सर्कुलर रूट की
बस, बस चलने ही वाली थी
रोक ली मैंने अपनी सीट खिड़की के पास वाली
चल दिया मैं शहर का सफर करने

ड्राइवर ने भी अपनी सीट पकड़ ली
और बजाने लगा “पो पो” भरने बस को

धीरे धीरे कर बस ने रफ्तार पकड़ी
और दौड़ने लगी
मौसम भी बढ़िया था
तेज हवा चल रही थी
और ऊपर से हल्की हल्की धूप छा रही थी
धूप का और बादल का भी अच्छा मुकाबला चल रहा था
कभी वह आती
तो कभी वह आते
जब बस में केवल एक ही सीट खाली थी
तो दो बूढ़े हंसते हंसों का जोड़ा चढ़ा
सीट खाली देख दादी बोली
“आप बैठ जाओ, कहां इतनी देर खड़े रहोगे”
तू दादा का जवाब आया
“तू बैठ जा, अभी नए दांत लगाए हैं
कहीं गिर जाएगी तो बाहर आ जाएंगे”
दोनों एक दूसरे की आदत
और प्यार को इतना अच्छी तरह से जानते थे
कि वह चाहती थी वह बैठे
और वह चाहते थे वह बैठे
अंत में हार कर दादी बैठ गई
और दादा के कंधे पर से सारा सामान अपनी गोद में समा लिया

खिड़की के बाहर झांका
तो एक ग्वाला अपनी गाय के साथ सफर कर रहा था
धूल उड़ाती जा रही थी वह
तो दूसरी तरफ एक धूल से भरी भैंस
तालाब में नहा रही थी
कहीं बच्चे गेंद लिए मैदान को जा रहे थे
तो कई बस्ता लिए नाम कमाने जा रहे थे
लहराती फसले थी
पेड़ों पर झूलते झूले थे
बिजली के खंभों पर उलझे तार थे
जब गौर से सोचा तो पता चला
कि ज्ञानी पंडित ही सबसे सुलझे थे

बस एक स्टैंड से दूसरे स्टैंड आगे बढ़ती थी
कभी खाली तो कभी भर्ती थी
थोड़ी गुफ्तगू कर हंसते मुस्कुराते
आखिरी स्टैंड आ गया
उतर गया मैं भी
एक अनोखा सफर आंखों में लिए
कुछ खूबसूरत तस्वीरे यादों में लिए

रास्ते में चलते चलते
एक ख्याल आया
जिंदगी भी बस का सफर ही है
टिकट खरीदते हैं ऊपर वाले से
एक सर्कुलर रूट की
वापस जाकर उसी से मिलते हैं
लेकिन साथ होती है
अनकही तस्वीरें
एहसास जो ना जताए जाए
यादें जो ना कहीं जाए
एक तजुर्बा होता है
हमारे पास ऊपर वाले के इस तमाशे का।

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