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ज़मीन से फ़लक तक

By |2020-03-02T11:22:03+00:00February 29th, 2020|Education, Inspiring Story, People|

ज़मीन से फ़लक तक, एक गूँज सुनाई देती है।
होंसलों की उड़ान की मन्ज़िल आसमाँ में दिखाई देती है।
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लाखों की भीड़ और उसमें एक खामोशी थी, जैसे सिक्का भी गिरे तो आवाज़ आ जाये और फिर चारों तरफ तालियों की गूंज-^- इतनी हुई के नाम तक सही से सुनाई नही दिया और तभी घूमती हुई रोशनी मेरे ऊपर पड़ गई…। ऐसा लग रहा था- जैसे घने अंधेरे के बीच एक चाँद निकल आया हो और वो सिर्फ मैं था।— सिर्फ मैं।

आंखों में शबनम के मोती, पनाह लेने कोशिश कर रहे थे, और मैं देखते ही देखते उन पलों में खोने लगा। जब बीमारी की वजह से बाबा ने आखरी सांस ली, माँ तो बचपन में ही जा चुकी थी जब मैं पैदा हुआ था, बाबा के पास कोई तस्वीर भी न थी माँ की लेकिन वो अक्सर कहते के तुम्हारी माँ बहुत अच्छी थी। बाबा को भी भगवान ने अपने पास बुला लिया था— टूटी-फूटी झोपड़ी और अकेला मैं, तब तो ये जानता भी नही था के अकेलापन क्या होता है ??? तब मैं सिर्फ ६ साल का था ।

कुछ दिन तक पड़ोसी, कुछ न कुछ दे जाते थे खाने को— धीरे-धीरे वो भी बंद हो गया। किसी के घर या दुकान में काम करता तो कोई खाने को दे देता और कोई भगा देता था। चुपचाप नदी किनारे जाकर बैठता और पानी को देखता रहता।

यूँही दिन गुज़रते जा रहे थे, एक दिन बैठा था, पानी का उफान अपनी गति पर था, तभी एक नन्हा बच्चा उसमें डूबने लगा मैंने बचाने की बहुत कोशिश की, बहुत चीखा, बहुत चिल्लाया पर दूर-दूर तक कोई नही था, कहीं से कोई आवाज़ नही थी, मेरी ही आवाज़ लौट कर मेरे ही पास आ रही थी, पर मैं भी क्या करता एक पैर जो पोलियो ग्रस्त हो चुका था, और आखिर कर मैं हार गया लेकिन नही बचा पाया ,,, उस मासूम बच्चे की मासूमियत नदी के तेज लहरों संग हवाओं के साथ दब चुकी थी और मैं बे तहाशा परेशान भागता रहा और शांत हो गया।

दिन गुज़रते गए, रात होती गयी, पर न मेरा वक़्त बदला और न ही हालात– उस नन्हे से बच्चे की मौत भी मुझे खाये जा रही थी के काश मुझे तैरना आता तो मैं उसे बचा पाता—फिर अचानक मेरी नज़र एक मक्खी पर गयी जो सूखे पत्तों पे तैर रही थी और जैसे ही वो सूखा पत्ता किनारे पे लगा वो किनारे से आ लगी , मैं करीब गया, फिर उस पत्ते को उठाकर देखा, तो पता चला उसका एक पंख टूट चुका था — और ये नन्ही सी जान नही उड़ पा रही थी—– औऱ तभी मुझे अपने पैरों का ख्याल आया के मेरे पैर भी काम नही करते लेकिन घुटने तक ताक़त थी इसमें— मैंने पेड़ की छाल काटी, एक बांस का फट्टा लिया और पैरों पे बांध दिया। और उसपे खड़े होना चाहा -“-“- पर ये क्या ???? धड़ाम ममममम—- फिर खड़ा हुआ और धड़ाम मममम— आखिरकार एक डंडे के सहारा लेकर खड़ा होने की कोशिश की फिर होता गया और धीरे-धीरे इस आरम्भ ने एक नई दिशा दी के मैं बिना सहारे के चल पा रहा था और इतना ही नही मैं धीरे-धीरे तैरना सीखने लगा।

जब भी कभी गांव में तैराकी होती तो मैं उसमें भाग लेता और उत्तीर्ण होता, यही सिलसिला धीरे-धीरे बढ़ता गया और इस मक़ाम तक ला कर खड़ा कर दिया । आज मेरी पहचान अपने देश के साथ विदेशो में भी होने लगी, और गर्व तब हुआ जब सब एक साथ मिलकर मेरे देश का गीत गुनगुनाने लगे। जन-गण-मन अधिनायक जय हे।

“अपंग था पैरों से, पर दिमाग से तो नही था।”
“हारा था ज़िन्दगी से, पर मरा तो नही था।”
“उड़ान रखी थी, उक़ाब से भी ऊपर मैंने,”
“लड़खड़ाया था बहुत, पर रुका तो नही था।”
“तलाशती रही थी मन्ज़िल मुझे हर पल”
“मैं जुगनू था राहों का, सूरज तो नही था”
“अपंग था पैरों से, पर दिमाग से तो नही था।”

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